Tuesday, December 11, 2018

मैथिली किस्सा – गोनू झा के ढाकी

मैथिली किस्सा - एक बेर कमलामे भीषण बाढ़ी आयल। गोनू झा के सेहो जजाति कमला महारानीक गर्भमे जा रहल छलनि। गोनू झा एक दिन नदीक कातमे गेलाह आ कल जोडि प्रार्थना कयलनि जे जं एहि बाढ़ीसं हमार फसिल धान बचि गेल तं हे कमलेश्वरी, अहाँकें एक हजार जीवक बलि चढायब।

Gonu jha paddy basket - Maithilisamachar

मैथिली किस्सा – कमला नदीक कछेड़मे पड़ैत रहनि गोनू झाक खेत। एक बेर कमलामे भीषण बाढ़ी आयल। सभक फसिल जलमगन भेल जा रहल छल। गोनू झा के सेहो जजाति कमला महारानीक गर्भमे जा रहल छलनि। गोनू झा के एक दिन नदीक कातमे गेलाह आ कल जोडि प्रार्थना कयलनि जे जं एहि बाढ़ीसं हमार फसिल धान बचि गेल तं हे कमलेश्वरी, अहाँकें एक हजार जीवक बलि चढायब।

कमला मैया हुनकर विनती सुनलथिन। हुनकर डूबल सम्पूर्ण जजातिक पानि सुखा गेलनि। बाढ़ीक पानिसं पटल खेत सभक धान लह-लह क उठल। गोनू झा आनन्द विभोर होइत गेलाह आ एहना स्थितिमे अपन देल वचनकें बिसरी गेलाह। धनकटनी आरम्भ भेल आ देखैत-देखैत धानसं हुनकर खरिहान उजगूज करय लागल। आब दाउन आरम्भ होयत तथा धान घर जायत कि एक दिन गोनू झाक पत्नी हुनका कमला मैयाकें देल वचन स्मरण दियौलथिन।

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गोनू झा कें एकाएक भक्क फुजलनि आ अपन गलतीक भान भेलनि। ओ चिंतासं छट-पट करय लगलाह। आब कि कयल जाय? एही छटपटीमे भोरसं साँझ भेल। साँझसं राति भेल आ ताही चिन्तामे गोनू झाकें निन्न भ गेलनि। सहसा निसभेर रातिमे हुनकर निन्न फुजलनि। देखैत छथि जे असंख्य उड़ीस हुनकर सोणीत – पान क रहल अछि। थोड़क काल तं ओ अथ उथमे रहलाह मुदा चोट्टे एकटा विचारक जन्म भेलनि। तुरत एकटा डिब्बा अनलनि आ गनि-गनि क निशचित भ गेलाह।

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निसभेर होइते ओही डिब्बा संग नदीक कातमे उपस्थित भेला। ओ कमला मैयाकें अपन वचनक स्मरण करबैत डिब्बाकें जलमे प्रवाहित कयल। डिब्बा थोड़ेक काल पनि पर दहाइत रहल फेर डूबि गेलाह। गोनू झा प्रसन्न भ गेलाह जे कमला माइ हमर चढौआ स्वीकार केलैन। ओय के बाद गोनू झा विदा भ गेलाह। रातिमे जखन गोनू सुतल छलाह तं कमला मैया स्वप्न देलथिन – “तो हमरा धोखा देलह अछि। जीवक बदला उड़ीस मारि हमरा बुरबक बनओलह अछि। जाह, हमहूँ श्राप दैत छियह जे तोरा एक ढाकीसं फाजिल अन्न नहीं होयतह।” आ कहैत अद्रश्य भ गेलीह।

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भीनसर भेल। गोनू झा अपन खरियान दिस अयलाह। तुरन्त जन अढओलनि आ हजार मोन अँटबा योग्य एकटा तरहरा खुनओलनि तथा ओकर पेनी कतरि ओही सोन्हि जकाँ पर बैस देलनि। एम्हर दाउन शुरू भेल। धान तैयार होइत गैल। जन सभ ओही ढाकीमे धान ढारैत जाय। धान बिलायल जाइक। भोरसं साँझ रातिमे बदलल गेल। मुदा ढाकी खालीक खालिये रहि गेल। गोनू झा खरिहानमे पड़ल-पड़ल एक निन्न घिचबाक व्योंत धरोअलनि। आँखी झलफलाय लगलनि। निन्न भ गेलनि कि ताखनहि कमला मैया स्वप्न देलथिन – “गोनू सरिपहूँ तों माहिर बुधियार छह। हमरहु ठकि लेलह। जाह हमर आर्शीवाद छह जे तोरा कियो पराजित नहि करतह।” गोनू झा दांत खिसोटै़त कमला मैयाकें प्रणाम कयलनि आ लघुशंका निवारणार्थ उठि विदा भ गेलाह।

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Web Title: मैथिली किस्सा – गोनू झा के ढाकी

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