Tuesday, August 14, 2018

मैथिली किस्सा – गोनू झा भोज कयलनि

जखन गोनू झा बृद्ध पिताक देहावसान भ गेलनि त गौंआँ लोकनिकें प्रसन्नता भेलनि जे एकटा दमगर भोज पारि लागत। सरझप्पीक बाद गौंआँ सभ गोनू झा क दलान पर जुमैत गेलाह आ हुनक पिताक महानताक बखान करैत वृषोरत्सर्ग श्राद्धक संग असिद्ध भोज करबाक सुझाब देब लगलथिन।

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मैथिली किस्सा : जखन गोनू झा बृद्ध पिताक देहावसान भ गेलनि त गौंआँ लोकनिकें प्रसन्नता भेलनि जे एकटा दमगर भोज पारि लागत। सरझप्पीक बाद गौंआँ सभ गोनू झा क दलान पर जुमैत गेलाह आ हुनक पिताक महानताक बखान करैत वृषोरत्सर्ग श्राद्धक संग असिद्ध भोज करबाक सुझाब देब लगलथिन। बेर बेर – असिद्ध भोजक आग्रह करैत देखि गोनू झा कहलथिन जे ओना त हमरा टका – पैसाक अभाव अछि, मुदा हम प्रयास करब आ अहाँ लोकनिक इच्छाक पूर्ति करबाक चेष्टा करब।

मुदा गौंआँ सभ एके ठाम कहि देलथिन जे पाइ बिना ककरो श्राद्ध कतहु पड़ल रहलैक अछि। सर – समाज आखिर कोन दिन लेल रहैत छैक। अहाँ मात्र ‘हँ’ कहि दियौक। सभ वस्तुक प्रबंध भ जैयतक। गोनू झा देखलनि जे इ सभ नहि मानत। मधुरक भोज गछबाइये क छोड़त आ ताहि लेल टाका पैसाक प्रबंध सेहो क देत। मुदा जखन मधुरक भोज करहिये पड़त तं कर्ज कियक लेब।

गोनू झा बजलाह – ‘ठीक छैक। अपने सभक इच्छाक पूर्ति होयत। हम टाका पैसाक जोगार स्वयं क लेब आ अहाँ सभक मूँह मिट्ठो करा देब।” सभ तृप्त होइत अपन-अपन घर जाइत गेलाह। क्रमशः श्राद्धक समय लगचियाल गेल आ गौंआँ सभ अपन-अपन पेट सोन्हाब लगैत गेलाह। श्राद्धक दिन जखन नोंत देब आरम्भ भेल त लोकक प्रसन्नताक मन अपना-अपना ढंगे खयबा आ लयबाक योजना बनबय लागल।

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संध्या काल जखन बिझहो भेल त केओ छिपली – लोटा, त केओ पितरिया बरगुन्ना, त केओ कसकुटक बट्टा ल क गोनू झाक घर दिस विदा होइत गेलाह किछु खन्हन किछु मोटरी बन्हनक मन्सूबा पोसने सभ हुनक दलान पर गज-गज करय लागल। चटपट बीड़ी बैसाओल गेल। करमान लागल लोक अपन उचित स्थान ताकि-ताकि बैसैत गेलाह।

पुरैनिक पात परसनाइ आरम्भ भेल। जिनका जेना इच्छा भेलनि, पात ल क ओकरा सजोलनि तथा जल-सिक्त करैत गेलाह। कने कालक लेल शांति पसरल रहल। फेर दू तीन बलिषट बारिक छिट्टा कन्हापर रखने आँगन सं बहरायल। छिट्टा देखैत देरी, सभक जीहसं पानी उधिआय लगलनि मुदा……. मुदा पात पर मधुरक बदलामे जखन कुसियारक छोट-छोट टोनी सभ खसय लागल त निमन्त्रित ब्राह्मन हहा – हहाक निचा खसय लगलाह – ई गोनूआँ सभकेँ बुरि बनाक चली गेलौं।

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तखने गोनू झा अपन बटलोही सन पेट पर हाथ फेरैत आँगनसं बहरयालह आ कहला – “हँ, त आब नैवेध देल जाय” पुनः कल जोडत आगू बजलाह – ‘आइ स्वर्ग में हमर पिता कतेक प्रसन्न होइ़त हेताह, जे एतेक रास ब्रह्मण देवता हुनका नाम पर बैसल भोजन क रहल छथि।’ गामक मुखियाकें नहि रहल भेलनि, बजलाह – “की हओ गोनू, एकोरत्ती तोरा लाज नहि होइछ जे दलान पर बैसा हमरा सभकेँ बुरि बना रहल छ।

गोनू झा गम्भीर मुद्रामे प्रत्युत्तर कयलथिन – “हम के होइत छी अपने सभकेँ बुरि बनौ़निहार। अहाँ लोकनि त जनै छी जे सब मिठाइयेक जड़ी होइत अछि कुसियार। तें तरह – तरह मिठाइक फेरीसं हम बुझल जे किएकने तकर मुले अपन लोकनिक समक्ष राखल जाय। होइयौ, आब अधिक विलम्ब नहि करियौ। ब्रह्मण देवता लोकनि कें जखन अपन गलतीक भान भेलनि त बकार नहि फुटलनि। अन्ततोगत्वा टोनिकें चिबबैत मोनहि – मों गोनूक श्राद्धक संग संग अपन-अपन पेटोक श्राद्ध कर लगलाह।

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Web Title: मैथिली किस्सा – गोनू झा भोज कयलनि

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