Thursday, January 17, 2019

मैथिली किस्सा – ‘गोनू झा’ के स्वर्ग से बजाहट

मैथिली किस्सा (गोनू झा के स्वर्ग से बजाहट): गोनू झा एकटा राजाक दरबारी रहथि। ओ बहुत चतुर छलथि आओर राजाक राज-काज मे मदद करैत छलथि। राजा गोनू झा क बहु मानैत छलथिन्ह संगहि आओर लोक सेहो खूब मानैत छलैन्ह।

मैथिली किस्सा – ‘गोनू झा’ के स्वर्ग से बजाहट

मैथिली किस्सा : गोनू झा एकटा राजाक दरबारी रहथि। ओ बहुत चतुर छलथि आओर राजाक राज-काज मे मदद करैत छलथि आओर हुनकर खूब मनोरंजन करैत छलथि। राजा हुनका बहु मानैत छलथिन्ह संगहि आओर लोक सेहो खूब मानैत छलैन्ह।

गोनू झाक उन्नति देखि क सभ दरबारी डाह करैत छल आओर हुनका मिटा देबाक उपाय सोचैत छल। ओहि मे एकटा हजमो छल। ओकरा अपना ज्ञानक घमण्ड रहै। ओ गोनू झा के मिटेबाक बीड़ा उठेलक।

गामक बाहर राजा के पिताक समाधि छल, राजा सबदिन अपना पिताक समाधि पर फूल चढ़ावय जाय छलथि। पिता पर हुनकर अटूट श्रद्धा छल, हजमा जकर फायदा उठाबय चाहैत छल आओर एकटा चाल चलल।

एक दिन राजा जखन पिताक समाधि पर फूल चढ़ाबेय गेला तखन ओहि पर एकटा पुर्जा राखल भेटलैन्ह। पुर्जा मे लिखल रहैय

 ब‍उआ अहाँ हमर बहुत भक्‍त छी हम अहाँ सँ अत्यन्त प्रसन्‍न छी। स्वर्ग मे हमरा पूजा-पाठ करबा मे बहुत दिक्‍कत होयत अछि ताहि लेल अहाँ शीघ्र गोनू झा के हमरा लग पठा दिय। गाम के पूरब मे जे श्मशानक मे ईंटक ढेरि अछि ओहि पर हुनका बैसा हुनका उपर दस पाँज पुआर राखि ओहि मे आगि लगा देबई तऽ ओ सीधे हमरा लग पहुँचि जैता। हम किछु दिनक बाद हुनका वापस भेज देब।

शुभाशीर्वाद
अहाँक स्वर्गीय पिता

पुर्जा पढ़िकय राजा चकरेला, एहन आश्‍चर्यक बात त ओ कतहु देखने नहि छलथि। ओ मोने-मोने बहुत तर्क वितर्क करय लगला। गोनू झाक शत्रु के ई चाल अछि या पिता जीक आज्ञा निश्‍चय नई कय सकला। ओहि दिन दरबार मे आबि राजा पुर्जा के हाल सबके सुनेलनि, सभ दरबारी खुश भ गेल। कियो कहय लागल-गोनू झा बहुत भाग्यवान छथि ताहि लेल स्वर्ग मे महाराजा याद कैलथिन्ह। क्यो बाजय छल-गोनू झा कतेक बड़का पुण्यात्मा छथि जे जीवैत स्वर्ग जैता।

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कियो डाह करैत बाजल- हमरा सभक सौभाग्य कहाँ ! नहिं तऽ सहर्ष जैबाक लेल तैयार भऽ जैतहुँ। एहि पर हजमा बाजल महाराज जिनक आदेश एलन्हि हुनके जैबाक चाही नई त महाराज के मोन में दुःख हेतैन्ह। साधारण लोक सँ काज नई हेत‍इ तें त गोनू झा के बुलाहट भेलैन्ह।

इमहर राजा बड़ सोच मे पड़ि गेला, कतऊ दुष्ट सभ मिलकय गोनू झा के मारबाक षड्‍यन्त्र त नहि रचलक अछि या ठीके पिताजी ई पुर्जा भेजने छथि। ओना अक्षर पिताजीक लिखावट सँ मिलैत छल। अन्त मे किंकर्तव्यबिमूढ़ भ ओ गोनू झा सँ विचार- विमर्श कयला।

गोनू झा एखन तक सब चुपचाप सुनि रहल छलथि। दरबारिक षडयन्त्रक अनुभव हुनका भ गेल छलैन्ह आ ओ एहि सँ बचबाक लेल सोचि रहल छला। हुनक कुशाग्र बुद्धि किछुये काल मे समाधान ढूंढि निकाललक। ओ कहलथिन्ह – महाराज हम स्वर्ग जैबाक लेल तैयार छी लेकिन हमर तीन शर्त अछि।

1) हमरा तीन मास के समय देल जाय।

2) जखन तक हम स्वर्ग सँ नहि घूमि कय आबी हमरा परिवार के सभ मास दस हजार टाका पारिश्रमिक के रूप मे देल जाय।

3) एहि समय हमरा पचास हजार टाका देल जाय, जाहि सँ घरक सभ इन्तजाम कय क जाय।

गोनू झाक बात सुनी राजा चकित भय कहलखिन-की अहाँ स्वर्ग जायब? की अहाँ एहि बात के सत्य मानैत छी?

गोनू झा कहलखिन – महाराज हम सचमुच स्वर्ग जायब। अहाँ चिन्ता नय करू। उदास भाव सँ राजा गोनू झाक शर्त मानि लेलथिन। सभ दरबारी के आनन्द आओर आश्चर्य के भाव रहै। हजमा अपना जीत पर हँसि रहल छल।

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