Saturday, December 15, 2018

मैथिली किस्सा – गोनू झाक पुरस्कार

गोनू झा के किस्सा : मिथिला दरबार प्रवेश द्वार पर नियुक्त एकटा द्वारपाल अत्यधिक लोभी आ घुसखोर छल। प्रायः दोसरे-तेसरे गोनू झा के किछु-ने-किछु पुरस्कार भेटैत छलनि, से देखि ओही द्वारपालकेँ करेज फाटय लगैक।

मैथिली किस्सा - गोनू झाक पुरस्कार (Maithili Samachar)

मैथिली किस्सा : मिथिला दरबार प्रवेश द्वार पर नियुक्त एकटा द्वारपाल अत्यधिक लोभी आ घुसखोर छल। प्रायः दोसरे-तेसरे गोनू झाकेँ किछु-ने-किछु पुरस्कार भेटैत छलनि आ से देखि ओही द्वारपालकेँ करेज फाटय लगैक। ओ सदिखन मनमे यैह योजना बनाबय जे कोहुना गोनू झा केँ फेरमे देल जाय, जाहिसँ प्राप्त पुरस्कारक किछु अंश ओकरो भेटि जाइक।

गोनू झा मनहि-मन द्वारपालक आशय बुझैत छलाह। एक दिन मगधसं एकटा पंडित शास्त्रार्थ करबाक उद्धेश्यसं दरबारमे अयलाह। मिथिला नरेश घोषित कयलनि जे हमरा दरबारक जे क्यो पंडित एहि मगध पंडितकेँ शास्त्रार्थमे पराजित करताह हुनका मुँहमाँगल पुरस्कार भेटतनि। दोसरे दिन शास्त्रार्थक समयक निर्णय भ गेल। शास्त्रार्थक दिन सभ पंडित नियत समय पर आबिक बैसि गेलाह। मुदा गोनू झाकेँ ओहि दिन दरबारमे आब मे बिलम्ब भ गेलनि। पैघ – पैघ डेग बढओने जखन गोनू झा प्रवेश द्वारपार पहुँचलाह त देखैत छथि जे प्रवेश द्वार बन्द अछि ओ ओत निशिचन्त भावे द्वारपाल बैसल अछि। गोनू झा हफसैत द्वारपालसं निहोरा कयलथिन जे आइ हमरा आब मे बड़ विलम्ब भ गेल। जल्दी प्रवेश द्वार खोलि दैह।

द्वारपाल निशिचन्ततापुर्चक हुनका दिस तकैत बाजल – ‘शास्त्रार्थ प्रारम्भ भेला बहुत काल भ गेलैक। एखन अपनेकेँ गेलासं शास्त्रार्थमे बाधा हेतै। महाराज हमरा पर कुपित हेता। हमरा माफी देल जाय। हम द्वार खोलबासं सर्वथा असमर्थ छी।’ गोनू झाकेँ भाँगठ नहि रहि गेलनि जे द्वारपाल की चाहैत अछि। ओ मनहि-मन किछु सोचि़क द्वारपालक खुशामद करैत बजलाह – ‘आइ दरबारसं जे किछु पुरस्कार भेटत ओ सभटा अहीं केँ द देब। आबो त द्वार खोलि दिअ।” आन्हर चाहय दुनु आँखि। द्वारपाल तुरत द्वार खौलैत बाजल – ‘आन क्यो रहितैक त हम किन्नहु द्वार नहि खोलितहूँ मुदा अहाँक – गप्प त भिन्न अछि। हे, त मोन राखब।”

शास्त्रार्थमे गोनू झा ओहि मगध पंडित केँ पानि पियाक छोड़ी देलथिन। मिथिला नरेश प्रसन्न भ कोषपालकेँ आदेश देलथिन जे गोनू झाकेँ एक सहस्त्र स्वर्ण-मुद्रा पुरस्कार स्वरुप देल जाय। एहि पर गोनू झा उदास होयबाक नाटक करैत कहलथिन – “महाराज, काल्हि अपने घोषित कयने रहिऐक जे मगध – पंडितकेँ पराजित कइनिहारक मुँह माँगल पुरस्कार भेटतैक मुदा आइ दोसरे गप्प सुनि रहल छी।” मिथिला नरेश मुस्की दैत उत्तर देलथिन ‘बेस, बुझि गेलौं। कोषपाल, हिनका दू सहस्त्र स्वर्ण-मुद्रा देल जाय।’ गोनू झा अविचलित होइत बजलाह – “सरकार, हमरा मुँहमाँगल पुरस्कार भेटबाक चाही।” मिथिला नरेश – ” बेस, मांगू अहाँ की माँगैत छी?” गोनू झा बजलाह – ‘महाराज, जाँ अपने हमरा पर प्रसन्न छी त आजुक पुरस्कार मे हमरा बीस सोंटाक पीटाइ चाही।”

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गोनू झाक विचित्र मांग सुनिक सभ व्यक्ति विस्मित भ गेल। नरेशक बारम्बार आग्रह कयलोक उपरांत जखन गोनू झा अपन मांग पर डटल रहलाह त हारि क नरेश दण्डधारीकेँ बजओलनि आ ओकरा आदेश देलथिन जे गोनू झाकेँ बीस सोंटा मारल जाय। दण्डधारी जखन हाथ सोंटा ल गोनू झा दिस बढ़ल कि गोनू झा अपन हाथ उठबैत महाराजकैँ सम्बोधन कयलनि – “सरकार, हम द्वारपालक संग वचनबद्ध छी जे आजुक पुरस्कार हम ओकरे देबैक, आ तेँ ई पुरस्कार ओकरे देल जाय जं हमरा कथनमे किछु संशय लगैत होअत तं द्वारपालसं पुछिये लेल जाय। द्वारपालसं जखन तं पूछल ओ गोनू झाक गपकेँ सहर्ष स्वीकार कयलक। फेर की छल। दण्डधारी गनि क बीस सोंटा द्वारपालकेँ लगओलक। ओहि दिनसं द्वारपालक नानी ने मरिहनु जे फेर गोनुसं अराड़ी मोल लेबाक साहस करथि।

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Web Title: मैथिली किस्सा – गोनू झाक पुरस्कार

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